हिन्दी-उर्दू मजलिस का मुखपत्र

जून माह के अंत तक प्राप्त चयनित रचनाएं पत्रिका 'परिधि' में प्रकाशित की जाती हैं. लेखक को एक लेखकीय प्रति नि:शुल्क प्रेषित की जाती है.
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Wednesday, June 22, 2011

गोविन्द दास नगरिया


तुम्हारी याद तब आती 

घुमड़ते मेघ जब नभ में 
धरा पर बरस जाने को 
चमकती दामिनी सुन्दर 
मेघ का मन लुभाने को 
उसी क्षण बूँद को पीने 
पपीही बोल जब जाती 
तुम्हारी याद तब आती 

उतर कर चांदनी भू पर 
छबीला नृत्य जब करती 
विकल हो कर दीवानी सी
चन्द्र को अंक में  भरती 
उसी क्षण गुदगुदाती जब 
पवन हर फूल औ' पाती 
तुम्हारी याद तब आती 

बसंत के आगमन पर जब 
प्रकृती श्रृंगार  कर उठती 
खिली हर-हर कली में तब 
मिलन की साध भर उठती 
उसी क्षण आम्र तरु पर जब 
कुयलिया गीत नव गाती 
तुम्हारी याद तब आती 
(गोविन्द दास नगरिया परिधि-६ )
 

नेमिचंद्र जैन 'विनम्र'


आत्म निरीक्षण 
हे  सम्मान चाहने वालो,पहले तुम खुद झुकना सीखो 
'भाषण-काव्य' सुनाने वालो, कृपया पहले सुनना सीखो 
औरो पर जो तुम हँसते हो, अपने पर भी हँसना सीखो  
करते हो जो व्यंग्य अन्य पर, अपनी त्रुटियाँ गिनना सीखो 
राह बताते जो लोगों को, उनको पहले खुद चलना है 
देते जो उपदेश हमेशा, नहीं पालना , खुद छलना है 
आंसू जो टपकें सच्चे हों, नहीं दिखावट उनमें होवे 
नाम मित्रता हो न कलंकित, नहीं गिरावट उसमें होवे 
मुस्कानें भी आत्मीय हों, संवेदन भी सत्य लिए हों 
सारे ही आचरण हमारे, जनहित का ही तथ्य लिए हों 
(नेमिचंद्र जैन 'विनम्र' परिधि-6)
 

Saturday, June 18, 2011

निर्मल चन्द 'निर्मल'


कैसे कह दें अपना देश महान 

तुम्ही बताओ कैसे कह दें अपना देश महान 
अनुशासन की कर दी छुट्टी राजनीति मतवाली 
मुख पर आदर्शों की झांकी मन मदिरा की प्याली 
सादे-कर्मठ जीवन पर है गिद्धों की रखवाली 
चुन -चुन किनको खा जायेंगे इनकी भूख निराली 
गांधी जी व  इंदिरा जी का कर बैठे जलपान 
तुम्ही बताओ---------
दूर कहाँ नज़रें ले जाएँ इनको  अपनी चिंता
जय-जय कार करा लेते हैं शोहरत के अभियंता 
कानूनों से ऊपर समझो कानूनों के हन्ता 
स्वागत करने को किराए की भूखी-प्यासी जनता 
तिकड़म का विधान रचते हैं करवाने गुणगान 
तुम्ही बताओ........... 
 बलशाली नेतृत्व खौफ़ से डरती है आबादी 
जिसकी लाठी भैंस उसी की कैसी ये आज़ादी 
लूटो, मारो,मौज उड़ाओ, कहते अवसरवादी 
क्या चरित्र माँ के बेटों का देख रही बर्बादी 
खुला हाट रिश्वत खोरी का , बिकता है ईमान 
तुम्ही बताओ ........
राजनीति न्यायालय पहुंचे न्यायतंत्र धमकाने 
न्यायपालिका भी शंकित है संशय हैं मनमाने 
आतंकित कर रहीं हवाएं, दहशतगर्द ज़माने 
तेरी-मेरी गिनती क्या है अल्लाताला जाने 
क्या भविष्य है लोकतंत्र का, क्या इसका सम्मान 
तुम्ही बताओ..........
देशी उद्योगों से इनका कितना रहा लगाव 
जगह- जगह स्थापित दीखते परदेसी फैलाव 
ढाल तर्क से कर लेते हैं अपना सतत बचाव 
करनी इनकी भोग रहे हम, घर-घर में टकराव 
साम, दाम व  दंड शिरोमणि, है इनकी पहचान 
तुम्ही बताओ..........  
                        परिधि-6 )
 
 

गोष्ठी- १७ जून २०११


सागर- नगर की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था हिन्दी-उर्दू मजलिस की २९६ वीं गोष्ठी संस्था के बड़ा बाज़ार स्थित कार्यालय में दिनांक १७ जून २०११ को  सम्पन्न हुई | इस बहुआयामी गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ट कवि श्री निर्मल चंद निर्मल ने की एवं संचालन श्री डॉ अनिल जैन अनिल ने किया .
गोष्ठी की शुरूआत करते हुए क्रान्ति  जबलपुरी ने गज़ल का शेर पढ़ा-मेरे माँ- बाप ने मेरी लहद पर फूल बरसाए / वतन के नाम जब लड़कर शहादत मिल गई मुझको //
डॉ.अनिल जैन अनिल ने हम भ्रष्टन केव्यंग्य रचना  पढते हुए कहा- भ्रष्टाचार/ हमें स्वीकार्य है / सदियों से स्वीकार्य है / जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी / वह / उतने बड़े सम्मान का अधिकारी
राम आसरे पाण्डे  ने रचना पाठ  करते हुए कहाअभी सुनते जाओ, कथा और भी है/ पढ़ा है अभी, लिखा और भी है.
श्रीमती निरंजना जैन ने चट्टान, मेला एवं सत्य-सूली रचना का पाठ करते हुए कहा- सत्य सूली पर टंगा है और हम बौने हुए हैं/ झूठ के जंगल घने हैं और हम छौने हुए हैं/ बंद हैं सब द्वार घर के, बंद हैं सब खिड़कियाँ/ रौशनी आये कहाँ से, हम तो बस कोने हुए हैं //
विनोद जैन अनुरागी ने रचना पढ़ी- लिखो क्षमा की आज इबारत, गाओ कंठ से मीठे गीत/ मन का तमस हटालो पूरा, बन जाएँ सब अपने मीत//
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ट कवि निर्मल चंद निर्मल ने रचना पढ़ी जो दिखी तस्वीर हमने देख ली/ आपकी तदबीर हमने देख ली/ है अचल बनकर विदेशों में पड़ी./ देश की जागीर हमने देख ली//

Friday, June 17, 2011

प्रमोद भट्ट 'नीलांचल'

तमन्नाओं   की  शिद्दत  कब  नहीं थी 
हमें  तुमसे   मुहब्बत   कब   नहीं  थी 
हसीं  फूलों  की  रंगत  कब   नहीं  थी 
मेरी  दुनिया  में  शोहरत कब नहीं थी 
सदा   अन्जान    सैय्यारों   से    देती 
फरिश्तों   सी  वो  सूरत  कब नहीं थी 
अभी आये हो तुम गुलशन में, लेकिन 
बहारों   की   ज़रुरत   कब   नहीं   थी 
जुबां  पर दिल से  आ  न पाई लेकिन 
तुम्हें  पाने  की  हसरत  कब नहीं थी 
वफ़ा   की   रौशनी   से    जगमगाती 
मुहब्बत  की  इमारत  कब  नहीं  थी 
गरीबों  की  सिसकती   बस्तियों  में 
अमीरों   की  हुकूमत  कब  नहीं  थी 
करे  परवाह  कब  तक  कोई  मजनू 
ज़माने  को  शिकायत  कब नहीं थी 
नगर  से  मौत  के  दावत तो  आती 
मेरे  क़दमों  में ताक़त  कब नहीं थी 
                                                प्रमोद भट्ट 'नीलांचल' 
..(परिधि-5)

Thursday, June 2, 2011

रचना पाठ गोष्ठी १ जून २०११

 सागर- नगर की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था हिन्दी-उर्दू मजलिस की 295 वीं गोष्ठी संस्था के बड़ा बाज़ार स्थित कार्यालय में दिनांक ०१ जून २०११ को  सम्पन्न हुई. इस बहुआयामी गोष्ठी की अध्यक्षता श्री सेठ मोतीलाल जी जैन ने की एवं संचालन श्री ऋषभ समैया जलज ने किया .

      गोष्ठी की शुरुआत करते हुए क्रान्ति जबलपुरी ने ग़ज़ल का शेर पढ़ा - 
तेरी नज़रें, तेरा अंदाज़, वो अहसास संदल सा / मैं देखूं ख्वाब जो तेरा, मेरा बिस्तर महकता है//
      डॉ.अनिल जैन अनिल ने गज़ल पढते हुए कहा
हुआ क्या है हाथों की तासीर को / ये उठते नहीं हैं दुआ के लिए //
      राम आसरे पाण्डे  ने रचना पाठ  करते हुए कहा
अपना घर मुझको बेगाना लगता है/गाँव मेरा मुझको अनजाना लगता है.//
      श्रीमती निरंजना जैन ने व्यंग्य रचनाओं के पाठ के पूर्व दोहा पढते हुए कहा
पगलाया मौसम हुआ,छिन-छिन बदले रूप/ कहीं चमकतीं  बिजलियाँ, कहीं कडकती धूप//
      संचालन कर रहे ऋषभ समैया जलज ने कहा- 
माँ जो रूठ जायेगी, फिर उसे मना लेंगे/और उसे मनाने में देर कितनी लगती है//
      वरिष्ट कवि निर्मल चंद निर्मल ने दोहा पढ़ा- 
उम्र चली आकाश को, धरती पकड़े पैर/ ऐसे में बोलो कहाँ निर्मल अपनी खैर//
      गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे श्रीमान सेठ मोतीलाल जी जैन ने कहा कि मैं आज की गोष्ठी में पधारे सभी कवियों से अभिभूत होकर जा रहा हूँ.
देर रात तक चली इस गोष्ठी में श्री  नेमीचन्द्र जैन विनम्र, विनोद अनुरागी, अक्षय जैन ने अपनी रचनाओं का वाचन किया. सुधी श्रोताओं में श्री योगेश चंद्र दीवानी, श्रीमती संध्या ,श्रीमती मधु जैन, आस्था जैन एवं सुभाष दिवाकर उपस्थित थे .